रूबरू | Part 12 | Rubaru – A Hindi Story of Love and Relationships

मिस मायरा, तुम्हारे यहां आने का मकसद हमें बहुत जल्द पता चल जायेगा।

तुम चालाकी से ब्लैक हाउस आ तो गईं, लेकिन एग्रीमेंट पेपर को बिना पढ़े साइन करके तुमने गलती कर दी। अब यही गलती तुम्हें बहुत भारी पड़ने वाली है।

...

अशमारा से आज बात हुई ? ठीक है ना वह? हमीद ने फिक्रमंद हेते हुए पूछा।

हां, हुई थी... ठीक है वह। आपकी खैरियत पूछ रही थी। 

मेरी बच्ची की ज़िन्दगी में खुशियां आने से पहले ही चली गईं। रूकय्या उदास हुई।

परेशान मत हों। हर बात में खुदा की मसलहत होती है। वह जो करता है बेहतर करता है। हमीद बीवी को तसल्ली दी।

उसने आफिस का नाम बताया?

नहीं।

अशमारा का हॉस्टल में रहकर काम करना मुझे परेशान कर रहा है। अगर वह इसी शहर में है तो आफिस के बाद घर भी तो आ सकती है। रूकय्या परेशानी भरे स्वर में कहा।

कोई वजह होगी ,आप परेशान मत हों। मुझे अपनी बेटी पर भरोसा है।

उसने यह क्यों कहा कि रिश्तेदारों को मत बताना की मैं इसी शहर में काम करती हूं... बल्कि दूसरे शहर बताना। रूकय्या को किसी तरह तसल्ली ही नहीं हो रही थी।

रिश्तेदारों का क्या है ज़रा सा बिंदु मिल जाए पहाड़ बना देंगे बात को। अपने शहर में रहकर घर ना आना, कितनों को हज़म होगी यह बात आप अच्छे से जानती हैं।

और अब ज़्यादा मत सोचिए ... उठिए, खाने की तैयारी कीजिए।

 कहते हुए हमीद उठ गए।

...

डिनर लग चुका था।

अशमारा दादी के साथ डाइनिंग रूम में आई। दादी के बैठते ही चुपचाप बाहर की ओर बढ़ने लगी।

कहां जा रही हैं? 

ताबिश की सख्त आवाज़ ने उसके कदम रोक दिए।

मैं बाहर हूं। कोई काम हुआ तो बुला लेना। 

वापस मुड़ कर शराफत से बोली।

वरना उसका मन तो कर रहा था कि सख्त जवाब दे। हर वक्त मेरी जान के पीछे पड़ा रहता है। 

बैठो... खाना खाओ।

ताबिश ने हुक्म हुआ।

नहीं, मैं बाद में खा लूंगी। 

एक बार मना करते हैं फिर खुद ही बुलाते हैं। मन ही मन भुनभुनाई।

बात को एक बार में सुनने की आदत डाल लो। अपनी बात कहकर ताबिश ने खाने पर नज़र दौड़ाई।

मुंह बनाकर मायरा चुपचाप बैठ गई।

दादी के होंठों पर मुस्कान आ गई।

ये मुंह किसे चिढ़ा रही हो? आखिर बॉस था वह।

दादी को तो दिखाने से रही... चेहरे पर मासूमियत लाकर बोली।

अपनी हैसियत मत भूलो... साथ बैठा लिया है, इसका बतलब यह नहीं कि हमारे जैसी हो गई। 

मुझे आप जैसा बनने का कोई शौक भी नहीं है, मैं जैसी हूं बहुत अच्छी हूं। वह दो-टूक बोली।

उठो, ताबिश ज़ोर से कुर्सी ढकेल कर अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ।

अब क्या हुआ? अभी तो आपने ही तो बिठाया है। मायरा कहां कम थी।

अब मैं ही कह रहा हूं उठो और जाओ यहां से। हमें सुकून से खाना खाने दो। अब उसका सब्र जवाब दे गया।

कुर्सी से उठकर अपनी प्लेट लेकर खाना निकालती है, और उसकी ओर देखे बिना बाहर निकल जाती है।

दादी आप इसे समझा दें वरना अगर मैं कुछ कर बैठूंगा तो आप बचा नहीं पायेंगी अपनी चहेती को। वह दोबारा बैठते हुए नाराज़ अंदाज़ में दादी से बोला।

जब साथ बैठाना ही नहीं था तो क्यों बुलाया? दादी भी नाराज़ हुई।

उसका मुंह बनाना गुस्सा दिला गया। उसे उसकी शक्ल याद आई।

दादी आप क्यों उसे अपने दोस्त की बेटी बता रहीं? खाना निकाल कर खाते हुए वह पूछ बैठा।

है कुछ वजह... वक्त आने पर बताऊंगी। दादी मुस्कुरा दीं।

दादी को मुस्कुराता देख उसके होंठों पर भी बेसाख्ता मुस्कान आ गई।

कितने दिनों बाद हमारे चेहरे पर मुस्कान आई है। दादी कहीं खो गईं।

और वह सिर्फ दादी को देख कर रह गया। लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो चुकी थी।

खाना खाकर ताबिश दादी के साथ लॉन में टहलने चला गया। दादी की रोज़ की आदत थी कि खाने के बाद कुछ देर लॉन में टहल कर तक कमरे में जाती थीं।

दादी यहां पर मेरी कोई ज़रूरत है? पीछे से मायरा की आवाज़ आई।

आओ तुम भी टहल लो। दादी उसे देख कर खुश हो गईं।

हां टहल लो... मुफ्त का लज़ीज़ खाना खाया है, हज़म भी तो होना चाहिए। उसका प्लेट में खाना निकालने का बदला कैसे न लेता।

अपने नसीब का खा रही थी... आपका हक नहीं छीन रही थी। वह भी तुनक कर बोली।

केयरटेकर हो... हमारी रिश्तेदार नहीं, कोई बात तो खामोशी से सुन लिया करो। एक बार फिर उसकी हैसियत जता गया।

शायद आपको मालूम नहीं मैं दादी के दोस्त की बेटी हूं। कहते ही दादी को अपनी बाहों में लेती है।

अच्छा अब तुम दोनों लड़ना बंद करो। दादी ने मामले का सम्भालना चाहा।

लड़ाई इन्होंने शुरू की थी। मैं तो...

हां तुम तो अल्लाह मियां की गाय हो। मायरा की बात पूरी भी नहीं होती है कि ताबिश बीच में ही मुंह बनाकर बोल पड़ता है।

लेकिन ताबिश की बात का वह जवाब देने के लिए खामोशी से आगे बढ़ जाती है। जो भी हो वह थी तो एक केयरटेकर ही। ताबिश का नाराज़ होना उसे सही लगा।

भला कौन मालिक अपने नौकर को इतना ज़ुबान चलाने की इजाज़त देता है।

क्या हुआ हार मान ली ?... उसकी तरफ झुककर कहते हुए आगे बढ़ गया।

मायरा उछल कर पीछे घूमती है। उसके उछलने पर ताबिश ज़ोर से हंस पड़ता है।

ताबिश के इस तरह करने से वह डर जाती है।

अंदर की तरफ जाती दादी मुड़ कर उनकी ओर देखती हैं। और मुस्कुरा कर मन ही मन दुआएं देती हुईं अंदर चली जाती हैं।

खामोश चेहरे के साथ मायरा भी अंदर की तरफ बढ़ जाती है।

कमरे में दादी को कोई काम हो सकता है। यही सोचते हुए वह रफ्तार बढ़ा देती है।

क्या हुआ मेरी बात का जवाब नहीं दिया। ताबिश भी उसके साथ हुआ। 

लेकिन वह खामोश ही रही। और आगे बढ़ती रही।

ताबिश ठहर गया। तुम क्यों आई हो ब्लैक हाउस? वह मन ही मन उससे सवाल करता है। और अंदर की तरफ कदम बढ़ा देता है।

अंदर जाकर अपने कमरे में जाते-जाते उसे मिस्टर सुब्हान की बात याद आई। और वह दादी के कमरे की तरफ बढ़ गया। दरवाज़ा खोलते ही देखा तो वह किताब पढ़ रही थी। और दादी बैठी सुन रही थी। 

दादी ने उसे अंदर आने का इशारा किया। लेकिन वह हाथ हिलाकर कर बाहर चला गया।

किताब पढ़ने के बाद मायरा और दादी देर तक उस किताब पर चर्चा करती रहीं।

अब मेरे सोने का वक्त हो गया है। दादी घड़ी देखकर कहती हैं। और उठ कर वॉशरूम चली जाती हैं।

उनके जाते ही वह उनका बिस्तर ठीक करती है।

वापस आकर दादी लेट जाती हैं।

दादी आपके पैरों की मालिश कर दूं? दादी के लेटते ही मायरा उनके करीब झुककर पूछती है।

नहीं, रोज़ की आदत नहीं है। कभी-कभी मालिश करा लेती हूं। रोज़ कराऊंगी तो आदत बन जायेगी। दादी ने मना किया।

अभी मैं लगा देती हूं। तेल लेकर उनके पैरों के पास बैठ जाती है।

और जब तुम नहीं रहोगी तब? दादी ने उसकी तरफ देखा।

जब तक हूं तब तक लगा देती हूं। जब नहीं रहूंगी तो कोई और कर देगा। वह रास्ता निकालती है।

तुम क्यों यहां आई हो? क्या सिर्फ अच्छी सैलरी या फिर कुछ ओर... दादी सोचती हैं कि उससे पूछें। लेकिन फिर खामोश रहीं।। क्या पता सच ना बोल पाए। रहने देती हूं फिर कभी... दादी ने आंख बन्द कर ली। लेकिन उन बंद आंखों के पीछे बहुत कुछ बिखर गया।

वह दादी के पैरों की मालिश करती रही। तभी दरवाज़ा खुलता है और ताबिश अंदर आता है। 

एक नज़र उस पर डालकर दादी के पास थोड़ा झुककर कोहिनी का सहारा लेकर दादी के सिर पर हाथ फेरता है। 

कितनी ही देर हो गई लेकिन ताबिश वैसे ही बैठा दादी के सिर पर हाथ फेरता रहा।

उसे इस वक्त ताबिश कुछ और ही लगा। अपने मिज़ाज से बिल्कुल अलग। यह वह ताबिश तो नहीं था जिसे उसने अब तक देखा था।

वह बाथरूम में चली गई। हाथ धोकर वापस आकर देखती है ताबिश वैसे ही बैठा हुआ था। उसे समझ नहीं आता कि अब क्या करे? जाए या रुके?

दादी तो सो चुकी हैं यही सोच कर दरवाज़े की तरफ बढ़ती है। धीरे से दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल जाती है।

कमरे में जाकर वह सोफे पर बैठते ही पीछे सिर टिकाकर आंख बंद कर लेती है। आंख बन्द करते ही बहुत सारे मंज़र उसकी आंखों में तैर गए। आकिल की बातें, शादी की तैयारियां और फिर आकिल की मौत...

जब हर आंख नम थी, हर दिल उदास था। उस वक्त आप मिस्टर बॉस विदेश दौरे पर निकल गए। जिसने आप के लिए मौत को गले लगा लिया। आपके दिल में उसके लिए ज़रा सा भी दुख नहीं था।

आकिल की मौत के बाद आप एक बार भी उसके घर क्यों नहीं आएं। उसकी हर सोच में उनके लिए नफरत थी। मेरा सवाल बहुत जल्द आपके सामने होगा। जवाब देने के लिए तैयार हो जाएं मिस्टर बॉस।

दरवाज़ा खुलने की आवाज़ पर सोचों का सिलसिला टूट जाता है। 

नज़र घुमा कर देखती है सामने ताबिश खड़ा था।


जारी है...

रूबरू भाग 11

रूबरू भाग 13







 






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